बिहार में सम्राट चौधरी बीजेपी विधायक दल के नेता चुने गए. सम्राट चौधरी ने कहा कि यह उनके लिए सिर्फ एक पद नहीं, बल्कि बिहार की जनता के सपनों को साकार करने का अवसर है।
नीतीश कुमार के इस्तीफे के बाद अब उनकी जगह बीजेपी के सम्राट चौधरी बिहार के मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं. पार्टी ने उन्हें विधायक दल का नेता चुन लिया है, जिसके बाद उनका सीएम बनना तय हो गया है. अब एनडीए की तरफ से सरकार बनाने का दावा पेश किया जाएगा. इस पूरे राजनीतिक परिदृश्य में ये जनना जरूरी है कि आखिर बीजेपी ने सम्राट चौधरी के नाम को ही आगे क्यों किया?
बीजेपी में लगातार बढ़ता कद सम्राट चौधरी के काम आया
साल 2018 में बीजेपी की सदस्यता लेने के बाद पार्टी के भीतर सम्राट चौधरी का कद लगातार बढ़ता गया. 2019 में जब नित्यानंद राय पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे तो सम्राट चौधरी को उपाध्यक्ष बनाया गया और फिर 2020 में एमएलसी बने. साल 2022 में नीतीश कुमार ने आरजेडी के साथ मिलकर बिहार में सरकार बना ली थी।
इसके बाद बीजेपी ने राज्य में बड़े स्तर पर बदलाव को लेकर दिल्ली में बैठक की थी. इस मीटिंग में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, बीजेपी के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा, समेत कई वरिष्ठ नेता मौजूद थे. बैठक के बाद विजय सिन्हा को विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और सम्राट चौधरी को विधान परिषद में नेता प्रतिपक्ष बनाने का फैसला लिया गया था.
राजनीतिक अनुभव आया काम
सम्राट चौधरी के खुद की मेहनत और राजनीति परिवार का अनुभव उनके काफी काम आया. सम्राट चौधरी की राजनीतिक ट्रेनिंग आरजेडी के भीतर पूर्व सीएम लालू प्रसाद यादव के की देखरेख में हुई. उनके पिता शकुनी चौधरी एक समय में लालू प्रसाद के सबसे करीबी में से एक हुआ करते थे. नीतीश कुमार की सहमति भी सम्राट चौधरी को सीएम बनाने को लेकर थी, जिसे बीजेपी नजरअंदाज नहीं कर सकती थी.
'लव-कुश' समीकरण साधने की कोशिश
सम्राट चौधरी के नाम को आगे कर बीजेपी जाति समीकरण अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश की है. नीतीश कुमार की जगह बीजेपी बिहार में एक प्रभावशाली ओबीसी चेहरे की तलाश में थी. सम्राट चौधरी कुशवाहा (कोईरी) समाज से आते हैं. वहीं नीतीश कुमार कुर्मी समाज से ताल्लुक रखते हैं. सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बनाकर बीजेपी ने 'लव-कुश' समीकरण साधने की कोशिश की है, जो बिहार में एक बड़ा वोट बैंक है.